-- एक अकेला भगवान और इतना बड़ा मकान --
"आलीशान मन्दिर बनाने के आजकल के लेटेश्ट फ़ैशन पर"
सूखे खेत की चुभन के बीच, सोचे खड़ा नंगा किसान,
एक अकेला भगवान और इतना बड़ा मकान ।
काले धन की माया से वत्स , हुए हैं ये भव्य कल्याण,
सादा जीवन की सीख देते, थके गाँधी व गीता पुराण।
भुला दी हमने वो बात, जब ठुकराय था प्रभू ने वो दान,
जिस पर लगा था शोषण-रक्त और बेइमानी के भद्दे निशान।
भुला दी गुरुओं की सीख, सिखाती कि सब हैं एक-समान,
गरीब सेवा ही सर्वोत्तम, गरीब ही में बसते भगवान
कलियुग के दौर में भैया, ’माया’ बन पड़ी बलवान,
भक्ति उसी भक्त की छाये, जो दे सबसे मोटा दान
एक से बढ़कर एक अमीर, हो रहे दानों के कीर्तीमान,
’अहम’ की तुष्टि ने हे प्रभू, बदली परिभाषा-ए-दान
असहाय-गरीब को दे दो न्याय, दो रोटी और एक मकान,
हर समर्थ सम्हाले एक गरीब, हो जाये यह धरा महान
वरना इक दिन जागेगा वो, गरीब के अन्दर का भगवान,
घुस जायेगा, छा जायेगा, हथिया लेगा तेरी ये प्रभू-दुकान
-- हिमांशु
नोट: सिर्फ़ पंक्ति "एक अकेला भगवान और इतना बड़ा मकान", मैंने मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली की किसी रचना में पढ़ी थी अत: साभार ले रहा हूँ।
Monday, January 07, 2008
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5 comments:
असहाय-गरीब को दे दो न्याय, दो रोटी और एक मकान,
हर समर्थ सम्हाले एक गरीब, हो जाये यह धरा महान
वरना इक दिन जागेगा वो, गरीब के अन्दर का भगवान,
घुस जायेगा, छा जायेगा, हथिया लेगा तेरी ये प्रभू-दुकान
सही कह रहे हो (हर समय की तरह) हिमांशु भैया
नीचे वाली बात हमारे ह्रदय के करीब है
"हर समर्थ सम्हाले एक गरीब, हो जाये यह धरा महान"
भाई हिमांशु जी
आप तो किसी की एक लाइन उधार लेते हैं, वह भी सबको बताकर, ये भगवानों के सौदागर तो अपने स्वर्ग के लिए तीन चौथाई दुनिया का हक-हिस्सा मारे बैठे हैं। इंसानियत के वधिकों को बनाने दीजिए बड़े-बड़े मंदिर और मकान, जनता का अंधड़ वक्त आने पर सब कुछ उलट-पुलट देगा।
....बहुत ही अच्छा लिखा है आपने। उम्मीद है आगे भी ऐसी रचनाएं पढ़ने को मिलती रहेंगी।
उत्साह वर्धन के लिये धन्यवाद रीतेश भाइ और जेपी भाइ।
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बहुत सुंदर लेख है.
मृणाल
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