Saturday, July 30, 2011

न्यू जर्सी में जन लोक पाल विधेयक जन-जागरण पद यात्रा

आगामी १४ अगस्त २०११ को ओक ट्री रोड, इज़्लीन, न्यू जर्सी में एक पद यात्रा आयोजित की जा रही है|
यह पद यात्रा "न्यू जर्सी इंडिया डे परेड" के साथ ही आयोजित होगी|

जन लोक पाल विधेयक के बारे में अधिक जानकारी "http://nriac.org/" व "http://news.indiaagainstcorruption.org/" पर प्राप्त करें|

समय: दोपहर १ बजे|
स्थान: अपना बाज़ार के सामने जहां से न्यू जर्सी इण्डिया डे परेड प्रारम्भ होती है|

संपर्क: दीपक गुप्ता (732-752-4144), हिमांशु शर्मा (201-563-8015), ईमेल: "netlal@yahoo.कॉम" |

और अधिक जानकारी इस पेज पर डाली जायेगी|

-- नोट:
१-- "इण्डिया डे परेड" के साथ-साथ हम सभी लोग पद यात्रा करेंगे| साथ में लोगो से बात करके उन्हें जागरुक करने का प्रयास करेंगे और कहेंगे की वे "http://news.indiaagainstcorruption.org/" वेब साईट पर जा कर और जानकारी प्राप्त करें और अमरीका और भारत में अपने परिवार, रिश्तेदार और मित्रों को कहें की वे यथा संभव जन लोक पाल विधेयक का समर्थन करें|
२-- पेम्पलेट: करीब २०० पेम्पलेट की व्यवस्था की जा रही है| लोगो को पेम्पलेट दिए जायेंगे और उन्हें जन लोक पाल के बारे में बताया जाएगा| अगर संभव हो तो लोगो में पेम्पलेट न बाँट कर उनसे उनसे सिर्फ बात की जाएगी जिससे अधिक कागज़ न व्यर्थ हो आर अधिक लोगों तक जानकारी पहुँच सके|
३-- गर्मी के मौसम का ध्यान रखें| टोपी, पानी की व्यवस्था करें|
४-- ....

सुझाव सादर आमंत्रित हैं|

-- दीपक गुप्ता (732-752-4144), हिमांशु शर्मा (201-563-8015), ईमेल: "netlal@yahoo.कॉम"|

Monday, November 22, 2010

खुश रहो आबाद रहो:

एक बुजुर्गवार के अनुभवों की झांकी:

१- मारना है जीतेजी तो छोड़ दे एहसान कर,
मर जाएगा वो यूं ही, एहसान के बोझ का मारा

२- अड़ते पे हंस दे, जलते पे जल बन,
गाली पर बन बहरा, तब ही गहरा जान

और आखिर में:

खुश रहो आबाद रहो,
न भूलो न याद रहो

कुछ बातें - 1

स्वस्थ रहने के लिए ४ नियम: ( श्री राजीव दीक्षित के व्याख्यान से )

१- खाना खाने के एकदम बाद पानी नहीं पीयें. कम से कम १ घंटे तक. खाना खाने से ४० मिनट पहले तक खूब पानी पी सकते हैं. अगर खाना खाने की बाद कुछ पीना ही है तो लस्सी, छाछ, फलों के रस, दूध पी सकते हैं. नाश्ते में फलों के रस, दिन में छाछ और रात में दूध पीयें और स्वस्थ रहो.
२- पानी हरदम घूँट-घूँट पीयो एकदम एकसाथ नहीं. मुंह की लार जो क्षारीय है , वो पेट के अम्ल को संतुलित करती है. सभी जानवर, पक्षी ऐसे ही करते हैं.
३- कभी भी ठंडा पानी न पीयें. (फ्रिज, कूलर, बर्फ आदि का)
४- सुबह उठते ही खूब पानी पीयो और तुरंत पाखाना जाओ. सुबह पेट में अम्ल होता है और मुंह की लार उसे संतुलित करती है. सुबह सुबह जिसका पेट साफ़ हो जाता है वो बहुत कम बीमार पड़ता है .

लत (शराब, सिगरेट, तम्बाकू, आदि ) छुड़ाने के तरीके:

१- रोज़ सुबह अपने दायीं नाक को बंद करके सिफ बाएं नाक से करीब ५ मिनट सांस लो . बाएं नाक की चन्द्र नाडी इच्छाशक्ति को बलवान करती है और किसी भी प्रकार की लत से छुटकारा दिलाती है .
२- अदरक के छोटे-छोटे तुकडे कर लें फिर उसमें नीम्बू और काला नमक छिड़क कर इसे धुप में सुखा दें . हमेशा इसे जेब में रखें और किसी भी प्रकार के नशे की इच्छा होने पर इसे चूस लें . विज्ञान कहता है जब भी कभी शरीर में सल्फर की कमी होती है तब व्यक्ति लत की तरफ भागता है । अदरक में सल्फर प्रचुर मात्रा में होता है . होम्योपेथिक की सल्फर-२०० (१००० अगर लत बहुत अधिक हो तो ) की १-२ सप्ताह तक रोज़ सुबह १ बूँद लेकर भी सल्फर पा सकते हैं .
३- ऋषि व्यास का उपाय (स्वामी तदात्मानंद के व्याख्यान से ) : जब भी कभी आप किसी नशीली चीज़ को देखें (जिसकी आपको लत हो) तो आप यह कल्पना करें, आप हॉस्पिटल में हैं और बीमारी की वजह से आपकी हालत बहुत खराब है, दवाई, ग्लूकोस की बोतलें चढ़ रही हैं .

-- हम सभी विज्ञान युग के हैं अतः इन्हें एक प्रयोग की तरह करें और अगर लाभान्वित हों तो दूसरों को भी बताएं .

Monday, August 04, 2008

Holy Haridwar

Holy Haridwar:
"Hari-dwar literally means gate to Hari (meaning God). Hence it is holy", this is how the spiritually inclined (or challenged :-) ) Indian father introduced Haridwar to his daughter, Ganga (very "cute name" ).

They were zooming into the city of Hariwar in an air-conditioned car, hence away from the 'unwanted elements', commonly callled dust, smoke, hot air and frowned upon by all educated humans. AC could check some elemnts but who can stop light? Every moment, light takes a picture (yes, digital) of the surrounding and forces into your eyes. Ofcourse your physical eyes should be open. Let's defer talking about spiritual eye for the moment. No wonder, Ganga saw the streets full of garbage which contained plastic bags, pan-masala/namkeen pouches, news-papers, human defecations, baby-diapers, fruit peelings, etc. and yelled "eyouuuuuuuuuu". The spiritual parents, frowned, smiled, shook their head, all in the same second. "These multinationals and packaged foods and ..."

"Indian culture being the oldest and richest, Haridwar is mentioned very highly in our scriptures. Haridwar has a special place in every Indian's heart", the father continued. "It is very sacred and lots of learned Gurus have ashrams here to spread the awareness about 'our' great heritage". Now the spiritual father felt proud of himself. How effortlessly he could churn out such meaningful words and elucidate the great Indian culture. But from inside, he realized that this was nothing but the effect of cultural programs and Desi fairs he attended back in the USA, which unknowingly enriched his vocabulary. Well! we learn a lot about our culture once we go out of our place, hence confirmed his long standing viewpoint, read in some Veda commentary ofcourse.

"Then why there is so much dirt and .. and ... streets are full of garbage here. Do we REALLY respect this sacred place?", now it was Ganga's turn, thanks to american education which makes our kids so inquisitive and straight-forward. Before the father could explain further, they reached the main parking lot near "Hari-ki-Podi", the place to wash sins, a spiritual wash-basin, literally. The parking lot was all mud, since it was made up of sand and garbage scattered here and there. Where ever there was dry land, pilgrims were sitting to take respite from hot and humid weather.Now they were out of the car. AC car couldn't stop elements to hug them. Smell from rotten garbage, smoke from large number of vehicles, dusty-hot-humid air brought the american pilgrims down to earth, literally again.

The father, mother and Ganga were all thinking: "Do really God likes to live here? While all pilgrims strive to live in clean and hygeinic place, they don't even make a small effort to clean their own 'Hari-dwar', the Gate-to-God".
That night the father-mother-Ganga trio stayed with local relatives in Haridwar. The relatives made it point to state that they don't go to Haridwar to take bath because of filth and they prefer to go to Rishikesh. The relative blaimed the municipality for not keeping city clean ("and bla-bla-bla.. whatever", Ganga was thinking, you guessed right :-) ).
Next morning, the father was doing his bit, cleaning the street where they stayed that night. He thought, the garbage is thrown by us (yes), the God is ours (YES), why should I leave cleaning for the government.The bottomline: "Do I want the "Gate to God" clean or not. No ifs, no buts."

"I like India, but it is very dirty", Ganga said. "Why can't we have separate "Gate to God" from America, which is clean?". "May be no more Gate-to-God are allowed because of heavy traffic up there".

When will these kids realize the real, very real, ultimate spiritual wealth?

Note: This is a very very real story and it has reference(s) to real living beings (including humans).

Tuesday, April 22, 2008

पृथ्वी दिवस


--: पृथ्वी दिवस :--

आप सभी को पृथ्वी दिवस की बधाई।
आज अच्छा दिन है यह विचारने का कि हमारे पास जो कुछ है वह पृथ्वी के कारण ही है। पृथ्वी पर किसी सभ्यता-संस्कृति, अर्थ-व्यवस्था, धर्म, देश से पहले भी समुद्र, नदियाँ, तालाब, पहाड़, पेड़-पौधे, औषधियाँ, फल, उपजाऊ-भूमि, आदि थे।
आओ ! पृथ्वी की इस असीम सम्पदा को संजोयें।

आओ ! डिब्बा-बन्द पदार्थों का कम इस्तेमाल करें जिससे कचरा कम फैले। आओ ! ताज़ा फल-सब्ज़ियाँ खायें और घर में खाना बनायें।
आओ ! कम कार-स्कूटर-मोटरसाइकिल चलायें और जन-वाहनों (बस-ट्रेन) का अधिक उपयोग करें। पैदल अधिक चलें, साइकिल अधिक चलायें।
आओ ! कम बिजली खर्च करें। रात को जल्दी सोयें और सुबह जल्दी उठें।

मेरी बेटी के विद्यालय-प्रोजेक्ट के तहत हमनें कुछ पुराने कपडो़ को काटकर एक दरी ( चित्र ऊपर) बनाई है। भारतीय कस्बों में इस तरह पुराने घिसे कपड़ों-वस्तुओं से कई उपयोगी वस्तुयें बनाई जाती हैं। इस तरह के कार्यों को जीवन में अपनायें और आने वाली पीढ़ी को सिखायें।

दरी में सहयोग::::::
मेरी श्रीमती जी का: दरी का आइडिया, डिज़ाइन, बुनाई और सिलाई।
मेरा: पुराने कपड़े की करतनें काटना और बुनना।
मेरी बेटी का: बुनाई और बेसबरी से प्रतीक्षा।
मेरे बेटे का: कपड़ों की करतनों से खेलना।

Monday, January 07, 2008

एक अकेला भगवान और इतना बड़ा मकान

-- एक अकेला भगवान और इतना बड़ा मकान --
"आलीशान मन्दिर बनाने के आजकल के लेटेश्ट फ़ैशन पर"

सूखे खेत की चुभन के बीच, सोचे खड़ा नंगा किसान,
एक अकेला भगवान और इतना बड़ा मकान ।

काले धन की माया से वत्स , हुए हैं ये भव्य कल्याण,
सादा जीवन की सीख देते, थके गाँधी व गीता पुराण।

भुला दी हमने वो बात, जब ठुकराय था प्रभू ने वो दान,
जिस पर लगा था शोषण-रक्त और बेइमानी के भद्दे निशान।

भुला दी गुरुओं की सीख, सिखाती कि सब हैं एक-समान,
गरीब सेवा ही सर्वोत्तम, गरीब ही में बसते भगवान

कलियुग के दौर में भैया, ’माया’ बन पड़ी बलवान,
भक्ति उसी भक्त की छाये, जो दे सबसे मोटा दान

एक से बढ़कर एक अमीर, हो रहे दानों के कीर्तीमान,
’अहम’ की तुष्टि ने हे प्रभू, बदली परिभाषा-ए-दान

असहाय-गरीब को दे दो न्याय, दो रोटी और एक मकान,
हर समर्थ सम्हाले एक गरीब, हो जाये यह धरा महान

वरना इक दिन जागेगा वो, गरीब के अन्दर का भगवान,
घुस जायेगा, छा जायेगा, हथिया लेगा तेरी ये प्रभू-दुकान

-- हिमांशु
नोट: सिर्फ़ पंक्ति "एक अकेला भगवान और इतना बड़ा मकान", मैंने मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली की किसी रचना में पढ़ी थी अत: साभार ले रहा हूँ।

Monday, December 24, 2007

कवि और रवि

-- कवि और रवि ( दी पोएट एण्ड लाइट )--

नोट: यह रचना एक सच्ची घटना पर आधारित हो सकती है। अगर है तो हमें बतायें और ईनाम पायें। धन्यवाद!

एक बार एक कवि (कविता लिखने वाला) और एक रवि (दसवीं में पढ़ने वाला आपकी तरह मनचला छात्र) एक साथ ( हाँ भई पास-पास और एक ही समय ) ट्रेन में बैठे जा रहे थे। मैं तो कहूँगा या तो भगवान या फिर ट्रेन, सिर्फ़ दो ही चीज़ें ऐसी हैं दुनिया में जो दो अनजान लोगों को न सिर्फ़ मिलाती है बल्कि काऽऽऽऽऽऽऽऽफ़ी देर तक मिलाऽऽऽऽऽऽऽऽती रहती हैं। बॉलिवुड की कई लीचड़ फ़िल्में इस बात का घटिया प्रमाण हैं।

खैर ! बात को और लम्म्म्म्बा ना खीँचते हुए, कवि जी किसी बड़े कवि सम्मेलन (अपने सम्मेलन सबको बडे़ लगते हैं जी) में अपनी कविता पहली बार पढ़ने जा रहे थे। आपमें से कई लोग-लोगिनियाँ उनकी मन:स्थिति या दिल:स्थिति समझ गये होंगे, या फिर बाल की खाल निकाल के बताऊँ?

रवि जी अपनी परीक्षा देने जा रहे थे और उनका आत्मविश्वास चेहरे से टपका जाता था। दसवीं की परीक्षा दसवीं बार जो दे रहे थे। रवि जी वैसे जीवन की परीक्षाओं में पास होते थे, लेकिन इन स्कूली परीक्षाओं में उनकी गोटी नहीं चलती थी। अब भैया, भाग्य से लड़ा तो नहीं जा सकता। काश! लड़ा जा सकता। छोड़ो भी, लड़ाई की बातें फिर कभी।

कवि और रवि के आपसी संक्षिप्त परिचय के बाद, कवि जी ज़ोर ज़ोर से अपनी कवितायें घोंट रहे थे, यानी तैयारी कर रहे थे। और रवि जी अपने जीवन के प्रायोगिक अनुभव से उनका मन ही मन जवाब दे रहे थे। सुनिये, मतलब देखिये, मतबल पढ़िये :

कवि: तु ही मेरी कविता है
रवि: कहाँ ? .... चल ठीक है, होगी
कवि : तेरे बिना चारों और अन्धेरा है
रवि : अबे आखँ हैं या बटन, इनको खोल
कवि: जहाँ देखूँ, अन्धेरा ही अन्धेरा है
रवि: लाइट जला

अचानक रवि जी के दिमाग में बल्ब जला और उन्हैं सूझा कि पढ़ाई तो ये ’कवितायें’ करने नहीं देंगी, क्यूँ ना इन्हैं लिख डालूँ। और रवि जी कवि जी के उवाच और अपने मन की भड़ास एक काग़ज़ पर उकेरने लगे।

कवि: तेरे दिल की गहराइयों में डूब रहा हूँ में
रवि: डूबके मर क्यों नहीं जाता
कवि: जब भी आँखें खोलता हूँ, तुम्हैं ही पाता हूँ
रवि: "स्टार-दस्त" (मतबल "स्टार-डस्ट", सार एक ही है) आँख पर रख कर मत सोया कर
कवि: मैं तो हूँ तेरे खयालों की गन्ध का छोटा सा प्यादा
रवि: अल्लाह की कसम मैंने नहीं पादा
कवि: तुम तो मेरी xxxx (सेन्सर्ड) हो
रवि: तू भी कम xxxx (सेन्सर्ड) नहीं
कवि: तुम होती तो ऐसा होता
रवि: कैसा ?
कवि: तुम होती तो वैसा होता
रवि: अबे साफ़-साफ़ बोल। बढ़िया है, मैं नहीं हुइ।
कवि: अब दिन-दिन नहीं रहे तुम्हारे बिना
रवि: बोले तो रात
कवि: और रात-रात न रही
रवि: सुबह हो गयी, चाय पी
कवि: कश्मकश में हूँ कि, किसे कहूँ, क्या कहूँ, कैसे कहूँ
रवि: डॉक्टर से मिल, टेस्ट करा, दवाइ ला, इलाज करा।

ट्रेन का सफ़र खत्म हुआ। जहाँ कवि जी के मन में सम्मेलन में कविता पढ़ने की सुगबुगाहट थी, वहीं रवि जी के मन में परीक्षा को दुत्कारने की पुरानी चाहत।

खैर हुआ वही जो धोनी (जी हाँ होनी नहीं धोनी) को मज़ूंर था। कवि जी के पीछे-पीछे रवि जी भी अपना काग़ज़ लेकर पहुंच गये कवि सम्मेलन। कवि जी की कविता को ’आह’ मिली तो रवि जी को ’सराह’। कवि जी की भद पिटी और रवि जी पर खूब ताली और साथ ही "हास्य-व्यंग्य की गम्भीर कविता" का ईनाम भी पा गये। फ़िलहाल रवि जी को बॉलिवुड से ऑफ़र का इन्तज़ार है।

--हिमांशु शर्मा

(a)२००७-८ सर्वाधिकार असुरक्षित

१. xxxx- अगर पाठक १८ साल से बड़ा है और सेन्सर्ड शब्दों को जाना चहता है तो अपनी दसवीं की अंक-तालिक (नोटेराइज़्ड) एक पता (स्वयं का ही) लिखे और टिकट लगे लिफ़ाफ़े में भेजें।
२. आपका नाम गुप्त रखा जायेगा। हमारी "मर जायेंगे पर नाम नहीं बतायेंगे" पॉलिसी पर हमें गर्भ है।
३. याद रखें, इन सेन्सर्ड शब्दों के बिना रचना का मज़ा कुछ भी नहीं। अगर आप अनपढ़ हैं तो हम फोन पर या व्यक्तिगत रूप में आकर ये शब्द बताने की व्यवस्थ कर सकते हैं।

Wednesday, September 19, 2007

मिच्छामि दुक्कड़म

गत वर्ष की तरह ( http://kyari.blogspot.com/2006/08/blog-post_29.html ) इस वर्ष भी पर्यूषण मनाया जाये। ज्ञानी-जन कह गये हैं कि दूसरों को क्षमा-दान देने में और दूसरों से क्षमा-दान माँगने में हमारी बहुत सारी मानसिक-शारीरिक समस्याओं का हल निहित है।

नमस्ते!
यदि मैंने जाने-अनजाने अपने विचार, शब्द या कार्यों से आपको व्यथित किया है तो पर्यूषण के पावन पर्व पर मैं हृदय से आपसे क्षमा माँगता हूँ। साथ ही मैं सभी जीव-अजीवों को क्षमा करता हूँ और मैं सभी जीव-अजीवों से क्षमा माँगता हूँ। मैं सभी जीव-अजीवों से मित्रता का व्यवहार करूँगा। मैं किसी से दुश्मनी का व्यवहार नहीं करूँगा और मैं सभी से क्षमा-प्रार्थी हूँ।
~!~!~!~!~
मुझे महसूस होता है कि मेरे मन में कई बार कई लोगों के प्रति कोइ बुरी बात (ईर्ष्या, घृणा, अहित भावना, क्रोध, द्वेष, आदि) उत्पन्न होती है। अधिकतर ऐसे विचार क्षणिक होते हैं लेकिन कभी-कभी ये बहुत दिनों तक मन में जगह बना लेते हैं। इस तरह के विचार मेरी क्रियात्मकता और सकारात्मक सोच को गलत तरह से प्रभावित करते हैं। दूसरी ओर मेरे जाने-अनजाने में किये गये अनुचित कार्य दूसरों को आहत करते है। भविष्य में मेरा प्रयास रहेगा कि में किसी को आहत न करूँ और अगर कर भी दिया तो क्षमा-याचना के लिये तत्पर रहूँ। अत: मेरा विश्वास है कि पर्यूषण पर्व मेरी मानसिक व शारीरिक शक्ति को एकजुट करने और उसे समाज सेवा में लगाने में सहायक होगा।

क्षमा-प्रार्थी,
हिमांशु

Thursday, September 06, 2007

सीसे का खेल

-- सीसे का खेल --

अब इसमें बेचारे मैटेल (देखें http://www.npr.org/templates/story/story.php?storyId=14176496 ) की क्या गलती कि जो खिलोने वो दुनिया भर के भोले-भाले बच्चों के लिये बनाते हैं उसमें सीसा ( metal lead ) था वो भी ’थोड़ा सा’ जी हाँ चिन्ना सा। अब यह तीसरी ही तो गलती थी पिछले कुछ दिनों में।
विकसित देशों में भले ही सीसा युक्त रंगों को लेकर कई वर्षों से खीँचतान होती रही है लेकिन भारत जैसे ’विकासशील’ और अन्य गरीब देशों को तो शायद ही यह समझ आये कि ये बवाल क्या है। सब जानते हैं कि भारत में भी आजकल ’मेड इन चाइना’ खिलौने शहर से लेकर गाँव तक हर दुकान पर मिल जायेंगे। हम जब भी भारत जाते हैं तो हमें ’मेड इन चाइना’ ही उपहार मिलते हैं।

मैंने यह पाया है कि अमरीका में इस बात की चर्चा में चिन्ता सिर्फ़ यहाँ के बच्चों की है, बहुत कम बातें इस बात पर हो रही हैं कि किस तरह अमानवीय स्थितियों मे चीन के कारखानों के गरीब मजदूर दुनिया-भर की चकाचौंध भरी मॉल में बिकने वाले इन उत्पादों को इतना सस्ता बनाते हैं। इन बातों को सोचने में शायद हमारे दिमाग की बुद्धि-मत्ता मात खा जाती है।

अब यह सब उपभोक्ता-चलित अर्थव्यवस्था का ही तो कमाल है। जब देखो बच्चों को उपहार में खिलौने दिये जाते हैं, इस आशा से कि उनका मनोरंजन होगा, मानसिक विकास होगा और सबसे बढ़िया वो हमारा (बड़े लोगों का, माता पिता का) दिमाग कम चाटेंगे और हमें कुछ ’साँस’ लेने की फ़ुर्सत देंगे। अब देखिये अमरीका में खिलौनों का कारोबार एक बिलीयन डॉलर (करीब चार-हज़ार करोड़ रुपये) का है।

एक और मुख्य बात आजकल की अर्थव्यवस्था की है वो है कि सरकारों और लोगों (निवेशकों) को कम्पनियों के वार्षिक वित्तीय परिणाम से ज़्यादा मतलब होता है, न कि उनके कार्य करने के तरीके और मानवीय पक्ष से। यहाँ देखें http://www.minyanville.com/articles/index.php?a=13982 कि किस तरह यह सिद्ध किया जा रहा है कि हमें इससे कोइ फ़र्क नहीं पड़ता कि कोइ कम्पनी अपने मजदूरों का कैसा खयाल रखती है, पर्यावरण के प्रति कितनी जागरुक है, आदि। हमें सिर्फ़ मतलब होना चाहिये कि उसके वार्षिक वित्तीय परिणाम कैसे हैं।

विकसित देशों मे तो एफ़ डी ए ( FDA ) जैसी सरकारी संस्थायें हैं जो कम्पनीयों के उत्पादों पर नज़र रखती हैं और यह सुनिश्चित करती है कि उनसे मनुष्यों और पर्यावरण को नुक्सान तो नहीं हो रहा है। दुर्भाग्य से अमरीका जैसे देशों में भी ऐसी संस्थाओं के पास संसाधनों की कमी होती जा रही है।

कल ही एक और खबर आई कि पॉप-कॉर्न बनाने वाली मशहूर कम्पनी कॉन-एग्रा ने अपने पॉप-कॉर्न में से एक रासायन डाइएसिटाइल को हटाने की घोषणा कि जिसे फ़ेफ़डों की एक घातक बीमारी का कारण बताया जा रहा है। पॉप-कॉर्न में जो बटर (घी) की खुश्बू होती है वो इसी रसायन के कारण होती है। देखें http://biz.yahoo.com/ap/070905/popcorn_lung_conagra.html?.v=8 । इस कम्पनी का "ACT II" पॉप-कॉर्न अमरीका में लाखों बच्चों-बड़ों द्वारा खाया जाता है। जी नहीं कम्पनी ने यह निर्णय किसी दैवीय हस्तक्षेप के बाद नहीं किया, बल्कि डेनवर नेशनल ज्यूविश मेडिकल सेन्टर के एक फ़ेफ़ड़ों के विशेषज्ञ द्वारा अमरीकी केन्द्रीय सरकार को लिखे एक पत्र के बाद किया जिसमें उन्होंने लिखा कि उनके पास ऐसा पहला उदाहरण है जिसमें एक उपभोक्ता ने वर्षों तक उस माइक्रोवेव पॉप-कॉन को खाया और उसे फ़ेफ़ड़ों का घातक रोग हुआ।

अब सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि ये खबरें प्रकाश में इसलिये आई क्योंकि ये कम्पनियाँ "बडी़" हैं या फिर मिडिया द्वारा इन्हैं ना छापना ना-मुमकिन था। लेकिन ऐसी बहुत सी खबरें हमें पता भी न चल पायें अगर सरकारी जाल-घरों पर वे उपलब्ध ना हों। यह http://www.fda.gov/opacom/7alerts.html एक ऐसा ही जाल-घर जहाँ "एफ़ डी ए" (US FDA) यानी "अमरीकी खाद्य एवं दवा प्रबन्धन" उत्पादों के बारे में सूचना देता है और आपको कई चौकाने वाली सूचनायें मिलेंगी। देखें http://www.cpsc.gov/ जहाँ अमरीकी उपभोक्ता उत्पाद संघ उत्पाद सुरक्षा के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देता है और मैटेल की कहानी भी यहाँ है http://www.cpsc.gov/cpscpub/prerel/prhtml07/07301.html । यहाँ http://www.usa.gov/Citizen/Topics/Consumer_Safety.shtml हर तरह की उपभोक्ता सुरक्षा के बारे में जानकारी है चाहे वो कार हो या बैंक या फिर पानी या केबल टीवी।

लाभ के पीछे दौड़ती कम्पनियों और उत्पादों के पीछे दौड़ते लोगों की इस पकड़म-पकड़ाई को थोड़ा धीमा किया जाना चाहिये। क्या हम (उपभोक्ता) कुछ कर सकते हैं या फिर हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहें और दुआ करें कि सरकार कुछ करे या फिर हिन्दी फ़िल्म की तरह मन्दिर जायें और कहें "खुश तो बहुत होगे तुम" ( पार्श्व संगीत हम्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म ......... )

-- हिमांशु शर्मा

Tuesday, July 10, 2007

मेरी प्यारी बिकाऊ भारतीय संस्कृति

-- मेरी प्यारी बिकाऊ भारतीय संस्कृति --

जब से भारत के बाहर मेरे कदम हुये, भारतीय संस्कृति के दर्शन हुए।
भारतीय संस्कृति लगी बिल्कुल नयी, या फिर हम थे उसके लिये नये।

रेस्तराओं में संस्कृति के नाम पर होती मौके-बे-मौके शाही दावतें में,
'देसी' लोग आत्महत्या करते भारतीय किसानों पर आश्चर्य जताते देखे गये।

विदेशी फ़ैशनेबल रहन-सहन और खान-पान की चमक दमक में,
आयुर्वेद, सादा जीवन को भूलकर, ' हैवी इण्डियन फ़ूड ' को नाक-भौं चिढ़ाते देखे गये।

रेडियो-टीवी पर अनगिनत रिमिक्स फ़ूहड़ गानों और विज्ञापनों के मेलों में,
संस्कृति के नाम पर बच्चे-बड़े-बूढे़ देखते-सुनते-सुनाते देखे गये।

टीवी के बोझिल सीरीयलों और घटिया हिन्दी फ़िल्मों की वादियों मे,
माँ-बाप अपने बच्चों को भारतीय संस्कृति दिखाते देखे गये।

बॉलिवुड के सितारों के चलताऊ और बदरंग 'शो' की लाइनों में,
'सेकण्ड जेनेरेशन' अमरीकी भारतीय, 'इण्डिया इज़ कूल' के नारे कहते देखे गये।

पहले जो माँ-बाप गर्व से अपने बच्चों से करते थे अंग्रेज़ी में गुटरगूँ,
अब वो अपने अनमने बच्चों को समझाते-बुझाते, हिन्दी-कोचिंग में देखे गये।

जो भूखा-नंगा भारत, NGO वाले दिखाते रहे हर फ़ण्ड-रेज़र में,
उसकी बातें सिर्फ़ पार्टी-गौसिप में सब भारतीय करते देखे गये।

वीकेण्ड की दावतों में बातें हुई 'ग्रेट इण्डियन कल्चर' और वेदों के अथाह ज्ञान की,
जिम्मेदारी के नाम ये 'ग्रेट इण्डियन', नेताओं को गाली देकर पल्ला झाड़ते देखे गये।

-- हिमांशु

Wednesday, June 06, 2007

welcome to Gaga Yoga

If you are in New Jersey (Edison area) please join.

Welcome to Gaga-Yoga:
When: Every Saturday morning 10 am.
Where and What is it: an hour of gathering in Colonial Park (Somerset http://www.somersetcountyparks.org/activities/parks/colonial_pk.htm ) to celebrate Laughter Yoga and Pranayam. Its is free.

Laughter Yoga: "Laughter is the best medicine". Since ninties when it was first started by Dr Madan Kataria of Mumbai, the laughter Yoga has evolved as a beautiful tool to de-stress your mind and body. 30 minutes of this will certainly revive you.

Pranayam: Does it need intro? Ayurveda believes that mind and stomach are the roots of all diseases. 30 minutes of pranayam including Bhasrika, Anulom-volom, Kapal-bhati, Ujjai (good for thioriod functioning and females), bhramari, etc. energizes the roots of our body. Some yoga practitioners will share their experience.

Plus: some play-in-the-woods adventure, boating and exercises for kids make it an ideal excuse to go out in summer.

Things to take: a napkin/towel. a floor mat (incase you don't wanna sit on grass).

Call:
732-632-7581 (Deepak)
201-563-8015 (Himanshu)
201-264-0329 (Reetesh)

or email " kyarilal AT yahoo DOT com " for further info.

Directions:
1. On 287 N take exit 10 and keep right. (park is 8-9 min from here)
2. Take left on first red light (Davidson ave.)
3. Take right on "New Brunswick Rd" at the end of Davidson.
4. Take left on "Elizabeth Ave."
5. Go ~2 miles, colonial park is on the right. Once inside the park, park your vehicle in the Parking Lot C and Gaga-yoga is on right in the picnic areas (benches).

Rain venue: Riverside Elks park in piscataway: This park is right on exit 9 on 287. Take exit 9 on 287, keep right and park is on the left side.

Tuesday, June 05, 2007

कृषक आमिर मुम्बईवाला

-- कृषक आमिर मुम्बईवाला --
अब किसान की उपाधी लेकर अमिताभ क्या 'फ़ेमस' हुए, आमिर भाई भी चले कृषक बन्ने।

ए, क्या बोलता तू,
ए क्या मैं बोलूँ,
सुन,
सुना,
करता क्या खेती?
क्या करूँ, करके मैं खेती,
किसान बनेंगे, फ़ार्म-हाउस बनायेंगे, गरीबी-गरीबी की एक्टिंग (मज़ाक) करेंगे और क्या।
बात सच्ची-मुच्ची सोचने वाली है। क्या यह सच है? या फिर और अधिक संवेदन्शीलता का मस्का लगाकर "क्या यह गरीबों का मज़ाक नहीं है"?

हालाँकि इसे भी हम एक खबर की तरह या इसका मज़ाक उड़कर इसे भुला सकते हैं।
लेकिन क्या हमें यह विचारने की ताकत और समय है कि इतने धनवान होकर भी ये लोग इस तरह की मक्कारी और निकृष्ट हरकतें क्यूँ करते हैं?

या फिर। क्या हमें सिर्फ़ दूसरों की मक्कारी ही दिखाई देती है? क्या हम सब या हमारे आस्पास के लोग-लोगिनियाँ ऐसे नहीं हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि जो जितना पढा-लिखा है या धनवान है वो उतनी ही बड़ी मक्कारी करता है (शोध का विषय बन सकता है - (c) कॉपीराइटेड ) । क्या परिग्रह का खेल खेलते-खेलते हम इतने गिर चुके हैं कि मानवता या राष्ट्र-हित हमारे दिल-दिमाग़ में होली-दिवाली ही आयें?
एक तरफ़ तो किसान आत्म-हत्या कर रहे हैं (यह हकी़क़त है) और दूसरी तरफ़ हम लोग सम्पत्ति के नाम पर ज़मीन, घर, फ़ार्म-हाउस, एशो-आराम के संसाधन खरीदे जा रहे हैं जिससे हम अपनी 'लाइफ़' 'इन्जॉय' कर सकें। यदि हमारी परिग्रह की दौड़ में कोइ कानून, मानवता आडे़ आती है तो उसे कुचलने में झिझकते भी नहीं।

हाल ही मैंने स्वामी रामदेव के लन्दन प्रवास का साक्षात्कार देखा था। उनसे पूछा गया, "आपको यहाँ आकर कैसा लगा?" स्वामी जी ने कहा "यहाँ के दैनिक जीवन में विज्ञान का अधिक प्रयोग है। दूसरी मुख्य बात कि यहाँ सफ़ाई है और लोग क़ानून का आदर करते हैं, उससे डरते हैं चाहे वो गरीब, अमीर या प्रभावशाली हों। हमें भारत में भी ऐसा हे करना है। कुछ चीज़ें हम पश्चिम को सिखा सकते हैं तो कुछ उनसे सीख भी सकते हैं....."

अपवाद सभी जगह हैं। लेकिन हमें सोचना है कि क्या हम हमारे देश से सच्ची-मुच्ची का प्रेम करते हैं या सिर्फ़ हमारी देश-भक्ति नारा देने, क्रिकेट देखने या फिर गणतन्त्र/स्वतन्त्रता दिवस पर टीवी ऑन करने तक ही सीमित है।

अगर हम अमिताभ या आमिर को सुधार पाये तो अच्छा है, लेकिन अगर स्वयं को नहीं सुधार पाये तो ....
... सीटी बजने में देर नहीं। तो अब करना क्या है?

Friday, June 01, 2007

दंगे में रंगे

दंगे में रंगे

गूजर और डेरा विवाद से, ये सच्चाई समझ आई,
लोगों के पास कितना व्यर्थ समय है भाई ।

मीडिया ने खबरें छाप-छाप के रेटिंग खूब बढ़ाई,
खबर मिली-सो-मिली, भावनायें खूब भड़कायीं ।

खून बहाने की आपकी दीवानगी पर मुझे फ़क्र है,
लेकिन आपकी-मेरी सोच में 19-20 का फ़र्क है ।

ये खून किसी हॉस्पीटल में जमाया होता,
किसी के प्रियजन को अवश्य बचाय होता ।

मैं तो कहूंगा आपका जीवन आज से देश के नाम कर दो,
गरीबी और भ्रष्टाचार मिटाने की जेहाद का एलान करदो ।

गुरू गोविन्द सिंह के सपूत बनकर बोलो 'सत-स्री-अकाल' ,
देश सेवा के लिये शहीद होकर, कायम करो मिसाल ।

किसान अमिताभ

किसान अमिताभ

देखें: http://www.bbc.co.uk/hindi/regionalnews/story/2007/06/070601_amitabh_land.shtml
आऊर देखें: http://news.bbc.co.uk/2/hi/south_asia/6711009.सतम

ना जी। धोका ना खाईये, ये वो फ़िल्मी गुस्सेल-युवा ( 'एंग्री यंग मैन' ) नहीं जो पैसों में बिकता है, फ़िल्मों में हिंसा मारधाड़ करता है, ऊल-जलूल गाने गाता है और अर्ध-नग्न नारियों के साथ आधुनिक नृत्य करता है। वो अमिताभ तो बाकी बॉलिवुड की तरह बिकाऊ है।

ये अमिताभ है, उत्तर-प्रदेश का एक भोला-भाला किसान। अब बात जे हुई बबुआ कि इस किसान ने पुणे में फ़ार्म-हाउस (अमीरों की झुपड़िया) बनाने के लिये एक खेती की ज़मीन खरीदने का आवेदन किया। अब ये निपूते कनून भी ऐसे कि पुणे की उस ज़मीन को तो सिर्फ़ कोइ किसान ही खरीद सकता है। अत: इस किसान ने यह शपथ-पत्र दिया कि ऊ। पी. (यू पी) के फ़ैज़ाबाद में उसके पास १९८३ से खेती की ज़मीन है। अब पुणे की पुलिस को पता नहीं किस अमरीकन कुत्ते काट खाया कि उन्हैंने शुरु कर दी तहकीकात। फिर क्या, फिरकनी । पता चला कि ऊ. पी. के खेत फ़र्ज़ी हैं। शायद 'मुलायम' से नाज़ुक रिश्तों की वज़ह से किसी सरकारी नौकर से ये भूल हो गयी और फ़र्ज़ी कागद बन गये। ये सब दैवीय क्रियायें हैं, हम जैसे नराधम क्या जानें।

अब ई तो संयोग ही है कि ई तो बॉलिवुड की कहानी सी बन पड़ी है। थोडी़ देर में एश्वर्या देवी का नृत्य होगा पुलिस का ध्यान बटाँने को। फिर ऊ अमिताभ अपने से आधी उम्र की छुकरिया के साथ नैन-मटक्का करेगा, पूरी पब्लिक का ध्यान बटाँने को। अगर ये सब भी काम ना आया तो जया जी के पास तो आँसूयों का महा-सागर है जिससे वो इन सारे पापों को धो देंगी।

अब भारत में जब जगह-जगह किसान आत्म-हत्या कर रहे हैं तो मुझे चिंता हो रही है। खैर, अमिताभ ई भी कह सकत हैं कि हम तो फ़िलम में ( और ई जीवन मा भी ) वही करते हैं जो 'रीयल लाइफ़ में होत है।

नोट: फ़िलम खतम होने पर सीटी बजाना ना भूलें।

Monday, April 30, 2007

काळू काळू, हाँ बापू

हाल ही में मैंने "जॉनी-जॉनी, यस पापा" का यह भारतीय संस्करण सुना-


काळू काळू, हाँ बापू
ज़र्दा खाया , ना बापू
झूट बोले, ना बापू
मुहँ तो खोल, आ ले थू-~~~~~~

Thursday, April 12, 2007

शेयर बाज़ार का जुआ

मेरे पिछले ६-७ साल के शेयर बाज़ार के कार्य-अनुभव पर आधारित।
मैंने आजतक ना कोइ शेयर प्रत्यक्ष रूप से खरीदा है और ना ही आगे खरीदने का कोइ इरादा है। हो सकता है कि मेरे कार्य-सेवा-समाप्ति ( रिटायरमेण्ट ) निवेश का प्रबन्धन करने वाली कम्पनी या मेरा बैंक अप्रत्यक्ष रूप से शेयर बाज़ार में निवेश करते हों। मेरा यह अनुभव है कि शेयर दललों और कम्पनियों के पास जो अन्दुरुनी जानकारी होती है और जिस तरह से वो अपनी हरकतों से बज़ार प्रभावित करते हैं, इन सबसे एक साधारण व्यक्ति का लड़ना बेमानी है।
--
शेयर बाज़ार की लूट है लूट सके तो लूट,
पैसे लगे हैं पेड़ों पर, भर ले सूट और बूट।

भर ले सूट, खरीद शेयर और बन काग़ज़ी मालिक,
मनमर्जी करें डायरेक्टर, जब-तब पोते तेरे मुँह पर कालिख।

मुहँ पर कालिख और हो-हल्ले में, भुलायें अमानवीय हरकतें हर क्षण,
प्रकृतिक सम्पदाओं - मजदूरों का शोषण या हो सांस्कृतिक प्रदूषण।

प्रदूषण मन में लालच का, कोइ हमें यह गणित तो समझाये,
कौड़ी का ये शेयर, हज़ारों में कैसे बिक जाये।

खरीद सस्ता बेच महंगा का ये खेल खिलाये चक्कर,
जुआ नहीं तो और क्या, बने एक मालदार जब हज़ारों बने फक्कड़।

बनें हज़ारों फक्कड़, लुटाई जीवन भर की कमाई और हुए 'पैदल',
जो हुए मालदार शेयरों मे, मीडिया बनाये उन्हैं 'आइडल',

भारत से लेकर अमरीका तक, हुये शेयरों में खूब उछाल,
मालामाल हुये दलाल और चोर, करोड़ों हुये कंगाल।

दलाल रखें अन्दर की खबर और करें खूब धन्धा 'बैक-डोर'
हर नियम की काट रखें वो, मुनाफ़े के लिये बनें 'इन्साइडर'

वार्षिक वित्तीय परिणाम और घोटालों के चलें प्रपन्च दना-दन,
भगवान जाने कितने काले हैं इन घोटाले करने वालों के मन।

सोचो, समझो और छोडो़ शेयर की ये दुनिया झूठी,
लालच छोड़ कोशिश हो कि मिले किसी भूखे को रोटी।

-- हिमांशु शर्मा

Wednesday, January 17, 2007

गुरुओं की बाढ़

-- २००७ --

व्यावसायिकताओं से भरी इस दुनिया में, भई गुरुओं की भीड़,
कोइ कराये झट प्रभू-दर्शन, कोइ दे मन-शान्ति गारण्टीड ।

मन-शान्ति गारण्टीड कह, मध्यम व उच्च वर्ग को ललचाये,
जेब हो खाली जिसकी, वो इन गुरुओं के पास फटकने ना पायें ।

कोइ कराये सत्संग अमीरों के, कोइ सिखाये फेफडे़ फुलाऊ प्राणायम,
पैसा है तो 'यू आर वेल्कम', तीसरी दुनिया को तो दूर से सलाम।

बातें करें महान भारतीय सभ्यता की ऐसी ऊँची-ऊँची,
भारत की दरिद्रता, गन्दगी देख, ईश्वर ने की गर्दन नीची।

मालदार आश्रम, मोटा 'रेज़ुमे', दुनिया-भर में अवाजाही,
पुरानी राबडी को नये ग्लास में देकर, लूटें खूब वाह-वाही ।

पश्चिम की हर बात माया-मिथ्या, सिखायें ये सबको भैया,
बातों पर ना लगे टेक्स, लेकिन गुरुजी सबसे बडा़ रुपैया।

सबसे बडा़ रुपैया जिनसे जुटाये ये सुविधायें आधुनिक जीवन की,
गुरुओं को सिखाये कौन कि ' गरीब में ही ईश्वर है ', पहले सेवा करो उनकी।

जबतक हैं गरीब असहाय है दुनिया में, सेवा हमें उनकी करनी है,
सुख शान्ति न गुरुऒं के आश्रमों, न अपने महलों मे, बात तय दिल में करनी है।
-- हिमांशु शर्मा

Wednesday, November 29, 2006

थैंक्स गिविन्ग

-- थैंक्स गिविन्ग --
अमरीका में हर वर्ष, नवम्बर के चौथे गुरुवार को मनाये जाने वाले थैंक्स गिविन्ग (Thanksgiving) उत्सव पर. इस दिन सभी लोग, अमरीका के कौने-कौने से यात्रा करके, सपरिवार इकठ्ठा होकर भगवान को धन्यवाद देते हैं और टर्की (bird turkey) खाते हैं। अधिक जानकारी http://en.wikipedia.org/wiki/Thanksgiving .

इस साल भी देखी खूब, थैंक गिविन्ग की धूम,
लोग हुए इकठ्ठा, खूब चबाई टर्की की दुम।

चबाई टर्की की दुम, टर्की की तो शामत आयी,
कैसा भगवान, कैसा धन्यवाद, किसे दे वो दुहाई।

हवाई-जहाज, कारों में भर-कर चली मानव की आँधी,
ट्रैफ़िक जाम, पैट्रॉल खर्च, ऐयर-लाईन्स की हुई चाँदी।

'सेल' की रेलम-पेल से हो रहे हर दुकान में दंगे,
समर्थ लोग भी टूटेँ ऐसे, जैसे जनम-जनम के भूखे-नंगे।

छूट और फ़्री की खरीद-दारी में सब भूले मानवता फ़र्ज,
तीसरी दुनिया का गरीब मजदूर चुकायेगा हमारी लालच का कर्ज़।

-- हिमांशु शर्मा

Tuesday, October 03, 2006

दशहरा मेला : रावण ने दी पार्टी

-- दशहरा मेला : रावण ने दी पार्टी --

बुराई पर अच्छाई की जीत की देखो कैसी उलटी रीत,
रावण ने क्या दे डाली पार्टी, हम भूले पुरुषोत्तम की नीति।

भूले पुरुषोत्तम की नीति, हर साल हो रहा रावण ऊँचा,
दिल में कर गया घर, राम को निकाल बाहर फैंका।

ऐसा फैंका बाहर कि राम दूर तक नज़र ना आया,
राम-लीला में भी देखो, शानदार रावण सबको भाया।

ऐसा छाया रावण कि ' सिम्पल ' राम को गये सब भूल,
बच्चों का क्या दोष, उन्हैं तो रावण ही लगे ' कूल '।

रावण लगे है ' कूल ', सब चाहें उससे ठाठ-बाठ और शान,
सच्चाई का उत्सव ना होकर, मेला बन गया बनिये की दुकान।

बनिये की दुकान, बेचें महंगे कपड़े, पानी-पूरी और चाट,
व्यर्थ बहायें कागज़, प्लस्टिक और धरती दें कचरे से पाट।

धरती पर कचरा, मन और पेट में कचरा समा गया,
रावण कैसा भी हो, पर उसके पार्टी में मज़ा आ गया।
रावण कैसा भी हो, पर उसके पार्टी में मज़ा आ गया।

-- हिमांशु शर्मा

Wednesday, September 13, 2006

मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट

-- मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट --

इकोनोमी मेरी डेमोक्रेसी मेरी, सरकार को कर दूँ 'सेट',
मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट।

फल पिचका के जूस पिलाऊँ,
रोटी भुला के, डबल-रोटी मुँह लगाऊँ,
रसोई-घर का हो गया मटिया-मेट,
मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट।

विज्ञान मशीनीकरण से उत्पादन बढाऊँ,
लाख गरीब पर एक अमीर बनाऊँ,
धरती माँ की मार दूँ रेड,
मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट।

वैश्वीकरण औद्योगीकरण के कानून बनाऊँ,
सस्ते ऐश्वर्य घर-घर पहुँचाऊँ,
शोषण प्रदूषण से आखँ मूँदकर, तीसरी दुनिया का काटूँ पेट,
मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट।

टीवी, रेडियो, अखबार में छाऊँ,
विज्ञापन दिखा-दिखा ललचाऊँ,
इच्छाओं से भर दूँ मन, दिल और पेट,
मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट।

एक-दो कौडी दान दूँ, पर उससे सामान अपना खरीदवाऊँ,
नई पीढी के पढे-लिखे धासूँ, सबको अपनी शरण बुलाऊँ,
बोनस, वेकेशन कार थमाकर, कर दूँ उनकी मोटी जेब
मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट।

सेलेब्रेटी जब चाहूँ बनाकर, फ़ेशन स्टेटस-सिम्बल चलवाऊँ,
सुन लो तुम हो जोकर, अगर न रहे अप-टू-डेट,
मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट।

दिल दहला युद्ध विभीषिका से, देखो मैं एक आसूँ ना बहाऊँ,
लाखों मरते भूखे-प्यासे, देखो मैं तो बाज़ ना आऊँ,
पहनो 'नाइकी' पीयो 'सोडा' और भरो 'चिप्स' से पेट,
मैं हूँ कॉर्पोरेट ओ दुनिया मैं हूँ कॉर्पोरेट।

--हिमांशु शर्मा